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  क्रिकेट का मिथक बन गए हैं सचिन शंकर चंद्राकर    क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर पर अब कुछ भी लिखना शायद सूरज को दीया दिखाने के समान है। फिर भी उनके बारे में जितना ज्यादा लिखो कम ही है। रिकार्डों का यह बादशाह अब उस ऊंचाई पर पहुंच चुका है कि उनका हरेक रन एक नए रिकार्ड को जन्म दे देता है। छोटे कद के इस महान खिलाड़ी के नाम अब इतने विश्व रिकार्ड दर्ज हो चुके हैं कि अब एक तरह से वे क्रिकेट का मिथक बन गए हैं। आस्ट्रेलिया के सार्वकालिक क्रिकेटर सर डॉन ब्रेडमैन के बाद दूसरे नंबर पर सिर्फ सचिन का नाम लिया जाता था। लेकिन ग्वालियर वनडे में दोहरे शतक का विश्व कीर्तिमान स्थापित करने के बाद तो पूरी दुनियाभर के दिग्गज क्रिकेटर व क्रिकेटप्रेमी मानने लगे हैं कि अब सचिन अपने आदर्श डॉन ब्रेडमैन से कहीं कोसों आगे निकल गए हैं और वे निर्विवाद सार्वकालिक क्रिकेटर हो गए हैं। 36 की उम्र में जब खिलाड़ी रिटायर होकर घर बैठ जाते हैं तब सचिन के खेल में और भी निखार आना किसी चमत्कार से कम नहीं है। उनका आत्मविश्वास और क्रिकेट के प्रति जूनून काबिल-ए-तारीफ है। शा...
अब सबक ले लें शिवसेना शिवसेना के विरोध के बावजूद शाहरुख खान की नई फिल्म ‘माई नेम इज खान’ आज मुंबई के सभी सिनेमाघरों में रिलीज हो गई। देशभर में पहले ही दिन फिल्म के हाउसफुल ने शिवसेना के विरोध को नकार दिया। अब समय आ गया है कि शिवसेना ओछी क्षेत्रवाद व विरोध की अपनी राजनीति से तौबा कर सबक ले लें। यदि शिवसेना अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए इसी तरह लोगों की भावनाओं व देश की एकता को भड़काने वाली राजनीति करती रही और मराठी व गैरमराठीवाद का कार्ड खेलती रही तो एक दिन उसे अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि अब जनता उसकी राजनीतिक चाल समझ चुकी है। उसे अन्य राज्य तो दूर महाराष्ट्र में ही मुंह की खानी पड़ेगी। अभी भी मौका है शिवसेना के नेतागण इस बात को समय रहते समझ जाए और जनता के विकास की राजनीति करे। देश व देश के लोगों से प्यार करना सीखे। तभी जनता उसे सिर आंखों पर बैठाएगी। अब तो महाराष्ट्र के लोग ही उनका विरोध करने लगे हैं। अनेकता में एकता ही भारत की दुनिया में विशेषता है। यह बात शिवसैनिकों को समझ लेना चाहिए। विरोध जरूर हो, लेकिन वह देशहित में हो। कभी भी अपने फायदे के लिए विरोध करना, लोग...

बकअप राहुल... शाबाश.. !!!

शाबाश राहुल !!! आपने शिवसैनिकों की धमकियों के बावजूद मुंबई में एक आम मुंबईकर की तरह सड़कों और लोकल ट्रेन में सफर कर मुंबई के शेरों को उनके ही मांद में दुबकने पर मजबूर कर दिया। वाकई में आप आम युवाओं के आदर्श हो सकते हैं। आपने भारतवासियों को संदेश दे दिया कि मुंबई हम सब की है और किसी की गीदड़ धमकी से डरने की जरूरत नहीं। ऐसा ही काम आज सभी मुंबईकर व आम लोगों को करने की जरूरत है। उनके स्वागत में उमड़ी आमलोगों व युवाओं की भीड़ ने भी संदेश दे दिया कि मुंबई किसी की जागीर नहीं है, हम सब भारतवासियों की है। राहुल के एक ही हौसले से शिवसैनिक व महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना आज बैकफुट पर आ गई। उनके नेता रुआंसे होकर यह कहने पर मजबूर हुए कि राहुल का हमने सैद्धांतिक विरोध किया। शाहरुख खान के मामले में भी शिवसैनिक के नेता नरम हो गए। उन्होंने टाकीज मालिकों को शाहरुख की नई फिल्म ‘माइ नेम इज खान’ के प्रदर्शन पर रोक लगाने संबंधी किसी भी तरह की धमकी देने से साफ इंकार कर दिया। यह सब हुआ राहुल गांधी के एक साहस से। यही साहस सभी भारतवासियों व आम लोगों में होने की जरूरत है।

आखिर ये देश किसका है????????

इन दिनों महाराष्ट्र में जो घटित हो रहा है, उसे देखकर दिल कचोटता है। शिवसेना व महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने वहां मराठी-गैरमराठी और भाषावाद का जो मुद्दा बनाया है। वह किसी भी सच्चे देशवासियों को बर्दाश्त नहीं होगा। मुंबई देश की धड़कन और आर्थिक राजधानी है। विश्व में समृद्ध शहर के रूप में उसकी एक पहचान है। मुंबई पूरे भारतवासियों की है और उस पर सभी भारतीयों को गर्व है। आखिर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए शिवसेना और महाराष्ट्र वन निर्माण सेना के नेता देश को बांटने वाले मुद्दों को इस तरह क्यों उछालते रहते रहते हैं? जिस तरह पाकिस्तान के हुक्मरान आजादी के बाद से अपनी राजनीति चलाने के लिए भारत विरोधी अभियान चलाए रहते हैं। वही काम यहां शिवसेना व उनके अनुषंगी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेतागण कर रहे हैं। वे भी यहां अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए समय-समय पर देश को बांटने वाले मुद्दा उछालते रहते हैं। दोनों में कोई फर्क नजर नहीं आता। उनके इन गैरजरूरी मुद्दों को प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया भी जिस तरह सनसनी की तरह पेश करते हैं। वह भी सोचनीय है। खबर बेचने के चक्कर में मीडिया उन्हें हीरो की तरह प...

क्यों न प्रेममय हो दुनिया

14फरवरी को पूरी दुनिया प्रेम उत्सव में डूब जायेगी, लेकिन भारत में कई तथाकथित कट्टरवादी संगठनों ने युवा जोडों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। एक तरह से फतवा जरी कर रहे हैं कि इस दिन वे घर से न निकलें, जैसे किसी प्रेम करना है या नही इन संगठनों से पूछकर करना पड़ेगा। हम क्या खायेंगे, क्या पियेंगे, क्या पहनेंगे, ये सब इनसे पूछकर करना पड़ेगा। प्रेम के इन पहरेदारों को कौन बताएं कि प्रेम कि कोई सरहद, कोई पहरा नहीं होते।

आतंक के खिलाफ अब हो आरपार की लडाई

एक बार फ़िर आतंकियों ने देश की धड़कन मुंबई को लहूलुहान किया और हम कुछ नही कर पाए। हमारे नेता इसमे भी एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर राजनीति करने से नही चुके। अब तक के इस सबसे बड़े आतंकी हमले में १८३ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, २५० से अधिक गयल हुए। इन सबसे बड़ी बात हमने अपने बेशकीमती जवान व अफसर गंवाए। इनकी भरपाई कभी नही हो सकती। अब समय आ गया है कि आतंकवाद के खिलाफ आर-पार कि लडाई शुरू करें। हमें इसके खिलाफ एकजुट होकर इस्रायेल की तरह नीति अपनानी होगी, जिन्होंने १९७२ में बर्लिन ओलंपिक में फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने उनके ११ एथलीटों को मौत के घाट उतर दिया था। इसके बाद इस्रायेल ने उस आतंवादी गुट में शामिल एक भी आतंकियों को नही छोड़ा और उनसे जुड़े सभी लोगों चुन-चुनकर मारा। इस अभियान को इस्रायेल ने लगातार बीस साल तक चलाया। आतंकियों के मांड में घुसकर उनका सफाया किया। उन आतंकियों में एक-दो फरार हैं, अभी भी इस्रायेल के गुप्तचर विभाग उसकी खोजबीन कर रहा है। हमारे राजनेताओं को बयानबाजी करने के बजाय इस्रायेल की तरह आतंकियों के मांद में घुसकर उसको nestnaabut करना होगा तभी आतंकवाद को khatm किया ja sa...

हिंसा पर जनतंत्र भारी

रायपुर, छत्तीसगढ़ में १४ नवम्बर को पहले चरण के लिए हुए ३९ सीटों के मतदान में नक्सलियों तांडव मचाया, लेकिन लोगों ने उसकी हिंसा को नकारते हुए सरकार बनाने के लिए वोट दिया। आंकडों के हिसाब से ६० फीसदी मतदान हुआ, जबकि मैदानी इलाकों में ६५ से ७० फीसदी मत पड़े। बस्तर, दंतेवाडा, बीजापुर जैसे नक्सली इलाके में बन्दूक के साये में मतदान हुआ। लोगों ने जान जोखिम में डालकर नक्सलियों को बता दिया की हम शान्ति चाहते हैं, विकास चाहते हैं, हिंसा नही। अख़बारों के अनुसार बस्तर में २४ स्थानों पर पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई । इनमें दो जवान शहीद हो गए । नक्सली उत्पात के कारण २१ बूथों पर मतदान भी नही हो सका । आखिर नक्सली चाहते क्या हैं। अपने ही बेगुनाह लोगों की जान लेकर वो क्या साबित करना चाहते हैं। वे तथाकथित जिस शोषण के खिलाफ हथियार उठाये हैं। वो ख़ुद आज भोले-भले आदिवासियों का शोषण करने लगें हैं। बेगुनाहों का जान ले रहे हैं। आज की तारीख में नक्सलियों का काम एक आतंकवादी व देशद्रोही की तरह है । उनको samjhana चाहिए की जिस hak के लिए वे ladai lad रहे हैं । वह सिर्फ़ लोकतंत्र का hissa होकर ही hasil किया ...

छत्तीसगढ़ चुनावी रंग में.

छत्तीसगढ़ एक बार फ़िर चुनावी रंग में रंगने वाला है। लेकिन इस बार यह चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण है। एक ओर नेताओं में जोसे तो दिख रहा लेकिन मतदाता खामोश है। खामोशी का यह ऊंट किस करवट बैठेगा कुछ कहा नही जा सकता सरकार किसकी बनेगी यह तो १४ नवम्बर और २० नवम्बर के मतदान के बाद ही तस्वीर साफ होगी। आज सिर्फ़ ईतना ही। जयछत्तीसगढ़, जय हिंद !