मंगलवार, दिसंबर 21, 2010

छत्तीसगढ़ के बस्तर के असली मोगली "चंद्रू"
एक  गुमनाम नायक की सच्ची कहानी


                                                 (फोटो) चीता (टाइगर) के साथ खेलता हुआ चंद्रू 






                                                              (फोटो)  चंद्रू  अब इस  तरह अपने घर में.
 

विशेष :-  बचपन से चीता के साथ खेलने वाले बस्तर के चंद्रू पर फिल्म 1950 -55 के दरम्यान कभी बनी थी। इसे एक स्वीडिश फ़िल्मकार ने बनाई थी. उस समय इस फिल्म को कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे. दुनियाभर में बस्तर और बस्तर का एक अनजान छः-सात साल का चंद्रू रातो-रात स्टार बन गया था. लेकिन जल्दी ही उसे भुला दिया गया. फिल्म निर्माण के करीब 40 -45 साल बाद नब्बे के दशक में वरिष्ठ पत्रकार केवल कृष्ण नें देशबंधु में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित कर उसे गुमनामी से बाहर निकाला था। चंद्रू फिर कुछ दिनों तक चर्चा में रहा,  फिर भुला दिया गया.  चन्द्रू आज वृद्ध है और वैसे ही जी रहा है जैसे एक आम बस्तरिया आदिम। पता चला कि पिछली बारिश में उसका घर भी बह गया था.....उसकी गुमनामी की तरह।                                                                           
 

शनिवार, नवंबर 27, 2010

  भारत ने एशियाई खेलों में पदकों का बनाया रिकार्ड
somdev devbarman
कामनवेल्थ गेम्स के बाद अब भारत ने एशियन गेम्स में भी मेडल्स का रिकार्ड बना दिया है। अपने इवेंट्स के आखिरी दिन भारत ने 4 गोल्ड, 3 सिल्वर और 4 ब्रांज समेत कुल 11 मेडल्स जीते। इसके साथ ही भारत ने इस एशियन गेम्स में 64 मेडल्स जीतकर नया रेकार्ड बना दिया। हालांकि वह किसी भी एशियन गेम्स में सबसे ज्यादा गोल्ड मेडल जीतने के रिकार्ड से 2 कदम दूर रह गया। 1951 में दिल्ली में हुए पहले एशियन गेम्स में भारत ने 15 गोल्ड मेडल जीते थे। इस तरह से भारत 16वें एशियन गेम्स में टाप 6 में जगह बनाने में कामयाब हो गया। भारत ने शुक्रवार को 4 गोल्ड, 3 सिल्वर और 4 ब्रांज समेत कुल 11 मेडल्स जीते। इसके साथ ही भारत की कुल मेडल्स की संख्या 64 हो गई। यह भारत का अब तक का यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।
 भारत ने इस एशियन गेम्स में 14 गोल्ड, 17 सिल्वर और 33 ब्रांज मेडल जीते।
इससे पहले भारत ने नई दिल्ली में 1982 में हुए 9वें एशियाई खेलों में 13 गोल्ड मेडल समेत 57 मेडल्स जीते थे। लेकिन भारत ने यहां पर 64 मेडल्स जीतकर नया रेकार्ड्स बना दिया। भारत ने हालांकि किसी एक एशियाई खेलों में सबसे अधिक गोल्ड मेडल 1951 में नई दिल्ली में ही पहले एशियन गेम्स में जीते थे। भारत तब 15 गोल्ड समेत 51 मेडल्स जीतने में सफल रहा था। दोहा में 2006 में हुए एशियन गेम्स में भारत ने 10 गोल्ड समेत 53 मेडल्स जीते थे।

शुक्रवार, मार्च 05, 2010


  क्रिकेट का मिथक बन गए हैं सचिन
शंकर चंद्राकर  
क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर पर अब कुछ भी लिखना शायद सूरज को दीया दिखाने के समान है। फिर भी उनके बारे में जितना ज्यादा लिखो कम ही है। रिकार्डों का यह बादशाह अब उस ऊंचाई पर पहुंच चुका है कि उनका हरेक रन एक नए रिकार्ड को जन्म दे देता है। छोटे कद के इस महान खिलाड़ी के नाम अब इतने विश्व रिकार्ड दर्ज हो चुके हैं कि अब एक तरह से वे क्रिकेट का मिथक बन गए हैं। आस्ट्रेलिया के सार्वकालिक क्रिकेटर सर डॉन ब्रेडमैन के बाद दूसरे नंबर पर सिर्फ सचिन का नाम लिया जाता था। लेकिन ग्वालियर वनडे में दोहरे शतक का विश्व कीर्तिमान स्थापित करने के बाद तो पूरी दुनियाभर के दिग्गज क्रिकेटर व क्रिकेटप्रेमी मानने लगे हैं कि अब सचिन अपने आदर्श डॉन ब्रेडमैन से कहीं कोसों आगे निकल गए हैं और वे निर्विवाद सार्वकालिक क्रिकेटर हो गए हैं। 36 की उम्र में जब खिलाड़ी रिटायर होकर घर बैठ जाते हैं तब सचिन के खेल में और भी निखार आना किसी चमत्कार से कम नहीं है। उनका आत्मविश्वास और क्रिकेट के प्रति जूनून काबिल-ए-तारीफ है। शायद इसी गुण ने उनको क्रिकेट का भगवान बना दिया है। उनके बल्ले में रनों की भूख इस कदर है कि उनके सामने युवा क्रिकेटर कहीं ठहरते नजर नहीं आते। 20 साल के खेल कैरियर में उनके कई समकालीन क्रिकेटर रिटायर हो गए और कई रिटायर होने के कगार पर हैं। लेकिन सचिन के बल्ले की धार अब भी ज्यों-की-त्यों है। उसमें रत्तीभर कमी नहीं आई है। टेनिस एल्बो की चोट के दौरान उनके आलोचक कहने लगे थे कि अब सचिन खत्म हो चुका है और वे वापसी नहीं कर पाएंगे, लेकिन उन्होंने अपने प्रदर्शन से न सिर्फ सबका मुंह बंद किया बल्कि क्रिकेटप्रेमियों को मुग्ध भी कर दिया।
जिस तरह से उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट व वनडे में तूफानी प्रदर्शन किया है, उसे देखकर उनके रिटायर होने की बात बेमानी लगती है। ग्वालियर वनडे में उनका खेल देखकर ऐसा लगा जैसे कोई दिव्य शक्ति उनके अंदर आ गई हो। वे दक्षिण अफ्रीका के दिग्गज गेंदबाजों की गेंद का सामना ऐसे कर रहे थे, जैसे वे उनको गेंदबाजी करना सिखा रहे हों। आज से 20 साल पहले 15 नवंबर 1989 को जब उन्होंने महज 16 साल छह माह की उम्र में पाकिस्तान के कराची से अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत की तो किसी ने सोचा •ाी नहीं था कि एक दिन यह मासूम बालक क्रिकेट की दुनिया की किवदंती बन जाएगा। अपने उस पहले टेस्ट मैच में सचिन ने सिर्फ 15 रन जोड़े थे जो आज 13,447 रनों का पहाड़ बन चुका है। उस मैच में पाकिस्तान के अब्दुल कादिर जैसे दिग्गज क्रिकेटरों पाक टीम के खिलाड़ियों ने सचिन को देखकर भारतीय टीम की खूब खिल्ली भी उड़ाई थी। इसका करारा जवाब उन्होंने 23 नवंबर 1989 को फैसलाबाद में शुरू हुए अपने कैरियर के दूसरे टेस्ट मैच में 59 रनों की पहली अर्धशतकीय पारी खेलकर दिया था। उसी समय से क्रिकेट के जानकारों को महसूस हो गया था कि एक दिन यह मासूम क्रिकेटर क्रिकेट को एक नया आयाम देगा। हालांकि सचिन ने उसी साल 18 दिसंबर को गुजरावालां में पाकिस्तान के ही खिलाफ अपने पहले अंतरराष्ट्रीय वनडे की शुरुआत निराशाजनक की थी, जिसमें वे बिना रन बनाए पैवेलियन लौट गए थे, लेकिन उसकी भररपाई उन्होंने 20 साल बाद 24 फरवरी को ग्वालियर में दोहरे शतक का विश्व रिकार्ड बनाकर कर दी। शायद इसे एक महान खिलाड़ी की जिजीविषा ही कही जाएगी, जो शून्य को दो सौ के आंकड़ा में बदल दिया और उसके लिए उन्हें 20 साल तक कड़ी मेहनत और एक लंबा फासला तय करना पड़ा। शून्य से शुरू हुआ उनका वह सफर आज वनडे में भी विश्व रिकार्ड के साथ 17,598 रनों की ऐतिहासिक चोटी पर पहुंच गया है। हालांकि कोई भी रिकार्ड स्थायी नहीं होता और एक दिन उसे टूटना होता है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण उस ऐतिहासिक चोटी पर पहुंचने वाला होता है, जो अन्य को उसे तोड़ने के लिए एक दिशा और प्रेरणा देता है। वनडे में 200 रनों का आंकड़ा एक दिन जरूर पार हो जाएगा। इसके बावजूद सचिन हमेशा के लिए उस दोहरे शतक के इतिहासपुरुष व जनक ही कहलाएंगे। सचिन की एक और खासियत उन्हें सार्वकालिक बनाती कि वे एक बेहतर गेंदबाज भी हैं, लेकिन उनकी इस प्रतिभा का उपयोग टीम इंडिया में नहीं हो पाया। वे ऐसे बेहतर स्पिनर हैं, जो लेग और आॅफ दोनों तरह की गेंदबाजी करने में माहिर हैं। वे अब तक टेस्ट में 52.22 के औसत से 44 विकेट और वनडे में 44.26 के औसत से 54 विकेट भी ले चुके हैं। अगर उनकी इस प्रतिभा का बेहतर उपयोग किया जाता तो वे दुनिया के महान गेंदबाजों में भी शुमार होते।
उनके आलोचक जब-तब कहते रहे हैं कि अकसर सचिन सिर्फ अपने लिए खेलते हैं। भले ही उनकी कई शतकीय या अर्धशतकीय पारी टीम इंडिया को जिताने में काम न आई हों लेकिन उन्होंने हमेशा अपने प्रदर्शन से टीम को जिताने में अहम भूमिका निभाई। टीम में उनकी उपस्थिति मात्र से विरोधी टीम के खिलाड़ियों के हौसले पस्त हो जाते हैं। विरोधी टीम का पहला मकसद सचिन को आउट करना होता रहा है। यह पहले भी होता था, अब भी हो रहा है। उनकी बल्लेबाजी का डर गेंदबाजों पर इस कदर हावी होता है कि जब वे क्रीज पर जम जाएं तो उनके सामने गेंद डालने से पहले गेंदबाज सिहर जाते हैं। इसका अंदाजा बल्लेबाजों में भय   पैदा कर देने वाले दुनिया के महान गेंदबाज शेन वार्न द्वारा सचिन के बारे में कहे गए उस बयान से लगाया जा सकता है, जिसमें उन्होंने एक बार कहा था, ‘सचिन का बल्ला उन्हें सपने में भी डराता है। उनके सामने गेंदबाजी करने से वे खौफ खा जाते हैं।’ शेन वार्न का यह खौफ आज भी उनके अंदर इस कदर घरकर बैठा है कि ग्वालियर वनडे में सचिन की वर्ल्ड रिकार्ड (नाबाद 200 रन) पारी देखकर उन्हें कहना पड़ा, ‘भगवान का शुक्र है कि रिकार्डों के इस बादशाह को वे गेंद नहीं डाल रहे थे। सचिन पूरी लय में थे। उनकी बल्लेबाजी देखकर तो यही लग रहा था कि रनों का प्रवाह रोकना किसी भी गेंदबाज के वश में नहीं था। मेरी नजर में इस रिकार्ड को बनाने के लिए सचिन से बेहतर खिलाड़ी कोई और नहीं हो सकता था।’ लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर भी सचिन की उस ऐतिहासिक पारी को देखकर यह कहने से नहीं चूके कि अब वे टेस्ट में ब्रायन लारा (400*) के रिकार्ड को तोड़ सकते हैं और वनडे में भी इससे और बड़ी पारी खेल सकते हैं। सचिन के बारे में दुनिया के सार्वकालिक महान क्रिकेटर सर डॉन ब्रेडमैन ने कहा था, ‘सचिन को सिर्फ टेलीविजन में खेलते हुए देखा है, वह मेरी जैसी ही टेक्नीक से स्ट्रोक लगाता है। मैंने अपना खेल कभी टीवी पर कभी नहीं देखा, लेकिन सचिन का खेल देखकर महसूस होता है, यह प्लेयर बिलकुल मेरे जैसा ही खेलता है।’ यह एक महान खिलाड़ी की एक महान खिलाड़ी के प्रति व्यक्त की गई भावना है। इतना बड़ा खिलाड़ी होते हुए सचिन हमेशा निर्विवाद रहे। विनम्रता व सौम्यता उनके अंदर इतनी कूट-कूटकर भरी है कि उन्होंने कभी किसी दूसरे साथी खिलाड़ी की बुराई नहीं की और न ही वे कभी विवादों में रहे। यही सब गुण उन्हें एक महान खिलाड़ी होने का सबूत देता है। उनका खुद का सपना है कि अगले साल भारतीय उपमहाद्वीप में होने वाले विश्वकप का खिताब दूसरी बार भारत को दिलाएं। उम्मीद करते हैं कि उनका यह सपना भी पूरा हो जाएगा।
क्रिकेट के इस भगवान को अभी और मुकाम हासिल करना है। कई और रिकार्ड अपने नाम करना बाकी है। इन 20 सालों में उन्होंने अपनी खेल टेक्नीक से देश ही नहीं, दुनिया के लोगों को क्रिकेट का दीवाना बना दिया। उन्होंने क्रिकेट में पिछले दो दशकों में बच्चों से लेकर युवा और बूढ़ों तक के दिलो-दिमाग व जुबान पर कपिल, गावस्कर को हटाकर सिर्फ सचिन का नाम बसा दिया। अब तो नई पीढ़ी के लिए क्रिकेट का मतलब ही ‘सचिन’ हो गया है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने महात्मा गांधी के बारे में कहा था, ‘आने वाली पीढ़ी शायद ही विश्वास करे कि हाड़-मांस का एक दुर्लभ  इंसान भी  इस दुनिया कभी पैदा हुआ था।’ सचिन के परिप्रेक्ष्य में भी यही कहा जा सकता है कि आने वाली पीढ़ी शायद ही विश्वास करे कि इस दुनिया में सचिन जैसा महान खिलाड़ी भी पैदा हुए हैं। सचिन के दोहरा शतक लगाने के बाद तो क्रिकेटप्रेमी समेत देशभर से उन्हें देश सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ देने की मांग उठने लगे लगी है। पूर्व भारतीय कप्तान अजीत वाडेकर, कपिलदेव, सुनील गावस्कर, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण समेत अन्य क्रिकेटरों नें भी उन्हें ‘भारत रत्न’ देने की मांग की है। सचिन भारत का गौरव है और वे निश्चित रूप से ‘भारत रत्न’ हैं। इसलिए उन्हें यह सम्मान मिलना ही चाहिए।  सचिन ने भी बड़ी विनम्रता से स्वीकार करते हुए कहा है कि ‘भारत रत्न’ पाना हर भारतीय का सपना होता है और वह भी उससे अलग नहीं है। बावजूद इसके उन्हें देश का यह सर्वोच्च सम्मान मिले या न मिले, लेकिन वे ‘भारत रत्न’ हैं और हमेशा रहेंगे।
                                                                                                         shankar.chandraker@gmail.com 

शुक्रवार, फ़रवरी 12, 2010

अब सबक ले लें शिवसेना


शिवसेना के विरोध के बावजूद शाहरुख खान की नई फिल्म ‘माई नेम इज खान’ आज मुंबई के सभी सिनेमाघरों में रिलीज हो गई। देशभर में पहले ही दिन फिल्म के हाउसफुल ने शिवसेना के विरोध को नकार दिया। अब समय आ गया है कि शिवसेना ओछी क्षेत्रवाद व विरोध की अपनी राजनीति से तौबा कर सबक ले लें। यदि शिवसेना अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए इसी तरह लोगों की भावनाओं व देश की एकता को भड़काने वाली राजनीति करती रही और मराठी व गैरमराठीवाद का कार्ड खेलती रही तो एक दिन उसे अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि अब जनता उसकी राजनीतिक चाल समझ चुकी है। उसे अन्य राज्य तो दूर महाराष्ट्र में ही मुंह की खानी पड़ेगी। अभी भी मौका है शिवसेना के नेतागण इस बात को समय रहते समझ जाए और जनता के विकास की राजनीति करे। देश व देश के लोगों से प्यार करना सीखे। तभी जनता उसे सिर आंखों पर बैठाएगी। अब तो महाराष्ट्र के लोग ही उनका विरोध करने लगे हैं। अनेकता में एकता ही भारत की दुनिया में विशेषता है। यह बात शिवसैनिकों को समझ लेना चाहिए। विरोध जरूर हो, लेकिन वह देशहित में हो। कभी भी अपने फायदे के लिए विरोध करना, लोगों की भावनाओं को भड़काना गलत है।

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

बकअप राहुल... शाबाश.. !!!

शाबाश राहुल !!! आपने शिवसैनिकों की धमकियों के बावजूद मुंबई में एक आम मुंबईकर की तरह सड़कों और लोकल ट्रेन में सफर कर मुंबई के शेरों को उनके ही मांद में दुबकने पर मजबूर कर दिया। वाकई में आप आम युवाओं के आदर्श हो सकते हैं। आपने भारतवासियों को संदेश दे दिया कि मुंबई हम सब की है और किसी की गीदड़ धमकी से डरने की जरूरत नहीं। ऐसा ही काम आज सभी मुंबईकर व आम लोगों को करने की जरूरत है। उनके स्वागत में उमड़ी आमलोगों व युवाओं की भीड़ ने भी संदेश दे दिया कि मुंबई किसी की जागीर नहीं है, हम सब भारतवासियों की है। राहुल के एक ही हौसले से शिवसैनिक व महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना आज बैकफुट पर आ गई। उनके नेता रुआंसे होकर यह कहने पर मजबूर हुए कि राहुल का हमने सैद्धांतिक विरोध किया। शाहरुख खान के मामले में भी शिवसैनिक के नेता नरम हो गए। उन्होंने टाकीज मालिकों को शाहरुख की नई फिल्म ‘माइ नेम इज खान’ के प्रदर्शन पर रोक लगाने संबंधी किसी भी तरह की धमकी देने से साफ इंकार कर दिया। यह सब हुआ राहुल गांधी के एक साहस से। यही साहस सभी भारतवासियों व आम लोगों में होने की जरूरत है।

बुधवार, फ़रवरी 03, 2010

आखिर ये देश किसका है????????

इन दिनों महाराष्ट्र में जो घटित हो रहा है, उसे देखकर दिल कचोटता है। शिवसेना व महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने वहां मराठी-गैरमराठी और भाषावाद का जो मुद्दा बनाया है। वह किसी भी सच्चे देशवासियों को बर्दाश्त नहीं होगा। मुंबई देश की धड़कन और आर्थिक राजधानी है। विश्व में समृद्ध शहर के रूप में उसकी एक पहचान है। मुंबई पूरे भारतवासियों की है और उस पर सभी भारतीयों को गर्व है। आखिर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए शिवसेना और महाराष्ट्र वन निर्माण सेना के नेता देश को बांटने वाले मुद्दों को इस तरह क्यों उछालते रहते रहते हैं? जिस तरह पाकिस्तान के हुक्मरान आजादी के बाद से अपनी राजनीति चलाने के लिए भारत विरोधी अभियान चलाए रहते हैं। वही काम यहां शिवसेना व उनके अनुषंगी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेतागण कर रहे हैं। वे भी यहां अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए समय-समय पर देश को बांटने वाले मुद्दा उछालते रहते हैं। दोनों में कोई फर्क नजर नहीं आता। उनके इन गैरजरूरी मुद्दों को प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया भी जिस तरह सनसनी की तरह पेश करते हैं। वह भी सोचनीय है। खबर बेचने के चक्कर में मीडिया उन्हें हीरो की तरह पेश करने लगते हैं। इससे भी उनका मनोबल और बढ़ जाता है। बल्कि मीडिया को चाहिए कि वह उन्हें ज्यादा कवरेज भी न करें, जिससे वे हतोत्साहित हो सकें। आम लोगों व बुद्धिजीवियों को भी चाहिए कि वे अपनी शुद्र राजनीति करने वाले ऐसे संगठनों का भी सड़क पर उतरकर विरोध करे। इस समय महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार भी शिवसैनिकों व उनके कार्यकर्ताओं के सुर में सुर मिला रही है। वहां उत्तर भारतीयों पर आए दिन शिवसैनिक व महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता मारपीट करते रहते हैं और धमकी देते रहते हैं और पूरा तंत्र चुपचाप देखता व सुनता रहता है।
एकता में अनेकता ही भारत की पहचान है। उत्तर से दक्षिण व पूर्व से पश्चिम तक देश एक है और किसी भी राज्य के नागरिकों को देश के किसी भी राज्य या हिस्से में रहने, नौकरी करने व बोलने की आजादी है। देश को बांटने वाला कोई भी करतूत देशद्रोह के समान है। दुख की बात है कि उनकी इन हरकतों को अन्य राजनीतिक पार्टियां भी मौन साधकर उनकी देश विरोधी हरकतों को चुपचाप देख रही हैं। जब कभी कुछ कहती है तो वह भी वोट के खातिर। सबसे बड़ी दुख की बात है कि राष्ट्रभाषा हिंदी को महाराष्ट्र में बोलने पर भी पाबंदी लगाने के लिए उत्तर भारतीयों पर शिवसेना व महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता जबरदस्ती करने लगे हैं। भाषा की स्वतंत्रता व्यक्तिगत होता है। भाषा तो अभिव्यक्ति का माध्यम है। हिंदी में बोलना तो गौरव की बात है। मराठी बोलने व सीखने के लिए किसी पर दबाव नहीं बनाया जा सकता है। अगर आवश्यकता होगी तो मुंबई में रहने वाले लोग उसे भी सीखेंगे, लेकिन वह व्यक्तिगत मामला है। इसे सीखने के लिए दबरदस्ती नहीं किया जा सकता। देश में हिंदी के साथ ही सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान है, लेकिन उसे सीखने के लिए जबरदस्ती नहीं किया जा सकता। लगता है शिवसेना व महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेतागण मुंबई और महाराष्ट्र को अपनी जागीर समझ बैठे हैं और जब चाहे व उसे अपनी उंगली पर नचा सके। देश को बांटने वाले ऐसे संगठनों व पार्टियों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। उत्तर भारतीयों व भाषावाद के मुद्दे पर पहली बार भाजपा ने शिवसेना का विरोध किया है, लेकिन वह भी अपनी राजनीतिक मजबूरियों की वजह से किया है। कांग्रेस सिर्फ खानापूर्ति कर रही है। आम लोग और बुद्धिजीवी दुबके हुए हैं। अगर कोई बोल देता है तो शिवसेना के कार्यकर्ता उसकी ऐसी की तैसी करने सड़क पर उतर आते हैं। शाहरुख खान मामले में यही हो रहा है। शाहरुख खान ने ऐसा कुछ नहीं कहा कि जिससे शिवसेना के सम्मान को ठेस पहुंचे। मगर शिवसेना को तो मुद्दा चाहिए था अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए सो अवसर देखा और शाहरुख खान का विरोध करना शुरू कर दिया। उनकी फिल्म ‘माइ नेम इज खान’ का प्रदर्शन भी मुंबई में रुकवा दिया। आखिर ये कैसी दादागीरी है? डर के मारे टाकीजों के मालिक भी फिल्म के पोस्टर हटा दिए। आखिर कब तक ऐसा चलेगा? शाहरुख खान को भी इन अतिवादी लोगों के सामने झुकना पड़ा और फिल्म को नुकसान पहुंचने के लिए फिल्म निर्माता से माफी मांगनी पड़ी। उन्हें उन अनकही बातों के लिए भी सफाई देनी पड़ी कि जो उन्होंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं, जो कुछ कहा वह उनका निजी राय थी। उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे किसी को ठेस पहुंचे और न ही वे कोई राजनीति करना चाहते हैं। क्या इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी नहीं है?
अगर सभी राज्यों के लोग शिवसेना व महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की तरह करने लगे तो देश का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। आज हम भारत को इक्वीसवीं सदी में विश्व शक्ति के रूप में देखने लगे हैं। क्या इस तरह टुकड़ों में बंटकर हम विश्व शक्ति बन पाएंगे? पूरी दुनिया की निगाहें भी हम पर आर्थिक शक्ति के रूप में टिकी हुई है। ऐसे में इस तरह की शुद्र घटनाक्रम दुनिया के सामने हमें शर्मींदगी महसूस कराती। आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल विलेज बन रही है। ऐसे में हम आपस में कभी भाषा के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर लड़कर खुद को कमजोर करने और छोटी मानसिकता का परिचय दे रहे हैं। समय रहते इन पर काबू नहीं पाया गया तो हमारा विश्व शक्ति व आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना सिर्फ सपना ही रह जाएगा।

बुधवार, फ़रवरी 11, 2009

क्यों न प्रेममय हो दुनिया

14फरवरी को पूरी दुनिया प्रेम उत्सव में डूब जायेगी, लेकिन भारत में कई तथाकथित कट्टरवादी संगठनों ने युवा जोडों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। एक तरह से फतवा जरी कर रहे हैं कि इस दिन वे घर से न निकलें, जैसे किसी प्रेम करना है या नही इन संगठनों से पूछकर करना पड़ेगा। हम क्या खायेंगे, क्या पियेंगे, क्या पहनेंगे, ये सब इनसे पूछकर करना पड़ेगा। प्रेम के इन पहरेदारों को कौन बताएं कि प्रेम कि कोई सरहद, कोई पहरा नहीं होते।

मंगलवार, दिसंबर 02, 2008

आतंक के खिलाफ अब हो आरपार की लडाई

एक बार फ़िर आतंकियों ने देश की धड़कन मुंबई को लहूलुहान किया और हम कुछ नही कर पाए। हमारे नेता इसमे भी एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर राजनीति करने से नही चुके। अब तक के इस सबसे बड़े आतंकी हमले में १८३ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, २५० से अधिक गयल हुए। इन सबसे बड़ी बात हमने अपने बेशकीमती जवान व अफसर गंवाए। इनकी भरपाई कभी नही हो सकती। अब समय आ गया है कि आतंकवाद के खिलाफ आर-पार कि लडाई शुरू करें। हमें इसके खिलाफ एकजुट होकर इस्रायेल की तरह नीति अपनानी होगी, जिन्होंने १९७२ में बर्लिन ओलंपिक में फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने उनके ११ एथलीटों को मौत के घाट उतर दिया था। इसके बाद इस्रायेल ने उस आतंवादी गुट में शामिल एक भी आतंकियों को नही छोड़ा और उनसे जुड़े सभी लोगों चुन-चुनकर मारा। इस अभियान को इस्रायेल ने लगातार बीस साल तक चलाया। आतंकियों के मांड में घुसकर उनका सफाया किया। उन आतंकियों में एक-दो फरार हैं, अभी भी इस्रायेल के गुप्तचर विभाग उसकी खोजबीन कर रहा है। हमारे राजनेताओं को बयानबाजी करने के बजाय इस्रायेल की तरह आतंकियों के मांद में घुसकर उसको nestnaabut करना होगा तभी आतंकवाद को khatm किया ja sakata है। आज आतंक के खिलाफ पुरी duniya हमारे साथ हैं। इससे अच्छा मौका हमें नही मिल सकता। यह sabko पता है की यह सब pakistan से sanchalit हो रहा है। हमें turant ही paak से हर सम्बन्ध samapt कर देना चाहिए। sher की तरह आतंकियों को chetavani देकर paakistaan स्थित आतंकी campon kon havai abhiyan chalakar dhvast कर देना चाहिए। भारत के खिलाफ जितने भी आतंकवादी sangathan है, सब के खिलाफ mission chalakar इसका सफाया karana होगा, तभी आतंकवाद को samapt कर सकते हैं। इसके लिए हमारे netaon को अपना tuchchepan छोड़कर एकजुट होकर sarakar का साथ दे। देश की जनता अब और jakhm bardasht नही कर सकती।

शुक्रवार, नवंबर 14, 2008

हिंसा पर जनतंत्र भारी

रायपुर, छत्तीसगढ़ में १४ नवम्बर को पहले चरण के लिए हुए ३९ सीटों के मतदान में नक्सलियों तांडव मचाया, लेकिन लोगों ने उसकी हिंसा को नकारते हुए सरकार बनाने के लिए वोट दिया। आंकडों के हिसाब से ६० फीसदी मतदान हुआ, जबकि मैदानी इलाकों में ६५ से ७० फीसदी मत पड़े। बस्तर, दंतेवाडा, बीजापुर जैसे नक्सली इलाके में बन्दूक के साये में मतदान हुआ। लोगों ने जान जोखिम में डालकर नक्सलियों को बता दिया की हम शान्ति चाहते हैं, विकास चाहते हैं, हिंसा नही। अख़बारों के अनुसार बस्तर में २४ स्थानों पर पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई । इनमें दो जवान शहीद हो गए । नक्सली उत्पात के कारण २१ बूथों पर मतदान भी नही हो सका । आखिर नक्सली चाहते क्या हैं। अपने ही बेगुनाह लोगों की जान लेकर वो क्या साबित करना चाहते हैं। वे तथाकथित जिस शोषण के खिलाफ हथियार उठाये हैं। वो ख़ुद आज भोले-भले आदिवासियों का शोषण करने लगें हैं। बेगुनाहों का जान ले रहे हैं। आज की तारीख में नक्सलियों का काम एक आतंकवादी व देशद्रोही की तरह है । उनको samjhana चाहिए की जिस hak के लिए वे ladai lad रहे हैं । वह सिर्फ़ लोकतंत्र का hissa होकर ही hasil किया ja सकता है। इसका सबसे अच्छा example अपना पड़ोसी राज्य nepal है। वहां के maovadion ने लोकतंत्र का hissa bankar अपना lakshya hasil कर लिया। आज वहां उनकी सरकार है। नक्सलियों को समझ जाना चाहिए की हिंसा के जरिये वे aapna lakshya hasil नहीं कर सकते unhe हथियार chhodna पड़ेगा।

बुधवार, नवंबर 12, 2008

छत्तीसगढ़ चुनावी रंग में.

छत्तीसगढ़ एक बार फ़िर चुनावी रंग में रंगने वाला है। लेकिन इस बार यह चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण है। एक ओर नेताओं में जोसे तो दिख रहा लेकिन मतदाता खामोश है। खामोशी का यह ऊंट किस करवट बैठेगा कुछ कहा नही जा सकता सरकार किसकी बनेगी यह तो १४ नवम्बर और २० नवम्बर के मतदान के बाद ही तस्वीर साफ होगी। आज सिर्फ़ ईतना ही।
जयछत्तीसगढ़, जय हिंद !