शुक्रवार, मार्च 05, 2010


  क्रिकेट का मिथक बन गए हैं सचिन
शंकर चंद्राकर  
क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर पर अब कुछ भी लिखना शायद सूरज को दीया दिखाने के समान है। फिर भी उनके बारे में जितना ज्यादा लिखो कम ही है। रिकार्डों का यह बादशाह अब उस ऊंचाई पर पहुंच चुका है कि उनका हरेक रन एक नए रिकार्ड को जन्म दे देता है। छोटे कद के इस महान खिलाड़ी के नाम अब इतने विश्व रिकार्ड दर्ज हो चुके हैं कि अब एक तरह से वे क्रिकेट का मिथक बन गए हैं। आस्ट्रेलिया के सार्वकालिक क्रिकेटर सर डॉन ब्रेडमैन के बाद दूसरे नंबर पर सिर्फ सचिन का नाम लिया जाता था। लेकिन ग्वालियर वनडे में दोहरे शतक का विश्व कीर्तिमान स्थापित करने के बाद तो पूरी दुनियाभर के दिग्गज क्रिकेटर व क्रिकेटप्रेमी मानने लगे हैं कि अब सचिन अपने आदर्श डॉन ब्रेडमैन से कहीं कोसों आगे निकल गए हैं और वे निर्विवाद सार्वकालिक क्रिकेटर हो गए हैं। 36 की उम्र में जब खिलाड़ी रिटायर होकर घर बैठ जाते हैं तब सचिन के खेल में और भी निखार आना किसी चमत्कार से कम नहीं है। उनका आत्मविश्वास और क्रिकेट के प्रति जूनून काबिल-ए-तारीफ है। शायद इसी गुण ने उनको क्रिकेट का भगवान बना दिया है। उनके बल्ले में रनों की भूख इस कदर है कि उनके सामने युवा क्रिकेटर कहीं ठहरते नजर नहीं आते। 20 साल के खेल कैरियर में उनके कई समकालीन क्रिकेटर रिटायर हो गए और कई रिटायर होने के कगार पर हैं। लेकिन सचिन के बल्ले की धार अब भी ज्यों-की-त्यों है। उसमें रत्तीभर कमी नहीं आई है। टेनिस एल्बो की चोट के दौरान उनके आलोचक कहने लगे थे कि अब सचिन खत्म हो चुका है और वे वापसी नहीं कर पाएंगे, लेकिन उन्होंने अपने प्रदर्शन से न सिर्फ सबका मुंह बंद किया बल्कि क्रिकेटप्रेमियों को मुग्ध भी कर दिया।
जिस तरह से उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट व वनडे में तूफानी प्रदर्शन किया है, उसे देखकर उनके रिटायर होने की बात बेमानी लगती है। ग्वालियर वनडे में उनका खेल देखकर ऐसा लगा जैसे कोई दिव्य शक्ति उनके अंदर आ गई हो। वे दक्षिण अफ्रीका के दिग्गज गेंदबाजों की गेंद का सामना ऐसे कर रहे थे, जैसे वे उनको गेंदबाजी करना सिखा रहे हों। आज से 20 साल पहले 15 नवंबर 1989 को जब उन्होंने महज 16 साल छह माह की उम्र में पाकिस्तान के कराची से अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत की तो किसी ने सोचा •ाी नहीं था कि एक दिन यह मासूम बालक क्रिकेट की दुनिया की किवदंती बन जाएगा। अपने उस पहले टेस्ट मैच में सचिन ने सिर्फ 15 रन जोड़े थे जो आज 13,447 रनों का पहाड़ बन चुका है। उस मैच में पाकिस्तान के अब्दुल कादिर जैसे दिग्गज क्रिकेटरों पाक टीम के खिलाड़ियों ने सचिन को देखकर भारतीय टीम की खूब खिल्ली भी उड़ाई थी। इसका करारा जवाब उन्होंने 23 नवंबर 1989 को फैसलाबाद में शुरू हुए अपने कैरियर के दूसरे टेस्ट मैच में 59 रनों की पहली अर्धशतकीय पारी खेलकर दिया था। उसी समय से क्रिकेट के जानकारों को महसूस हो गया था कि एक दिन यह मासूम क्रिकेटर क्रिकेट को एक नया आयाम देगा। हालांकि सचिन ने उसी साल 18 दिसंबर को गुजरावालां में पाकिस्तान के ही खिलाफ अपने पहले अंतरराष्ट्रीय वनडे की शुरुआत निराशाजनक की थी, जिसमें वे बिना रन बनाए पैवेलियन लौट गए थे, लेकिन उसकी भररपाई उन्होंने 20 साल बाद 24 फरवरी को ग्वालियर में दोहरे शतक का विश्व रिकार्ड बनाकर कर दी। शायद इसे एक महान खिलाड़ी की जिजीविषा ही कही जाएगी, जो शून्य को दो सौ के आंकड़ा में बदल दिया और उसके लिए उन्हें 20 साल तक कड़ी मेहनत और एक लंबा फासला तय करना पड़ा। शून्य से शुरू हुआ उनका वह सफर आज वनडे में भी विश्व रिकार्ड के साथ 17,598 रनों की ऐतिहासिक चोटी पर पहुंच गया है। हालांकि कोई भी रिकार्ड स्थायी नहीं होता और एक दिन उसे टूटना होता है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण उस ऐतिहासिक चोटी पर पहुंचने वाला होता है, जो अन्य को उसे तोड़ने के लिए एक दिशा और प्रेरणा देता है। वनडे में 200 रनों का आंकड़ा एक दिन जरूर पार हो जाएगा। इसके बावजूद सचिन हमेशा के लिए उस दोहरे शतक के इतिहासपुरुष व जनक ही कहलाएंगे। सचिन की एक और खासियत उन्हें सार्वकालिक बनाती कि वे एक बेहतर गेंदबाज भी हैं, लेकिन उनकी इस प्रतिभा का उपयोग टीम इंडिया में नहीं हो पाया। वे ऐसे बेहतर स्पिनर हैं, जो लेग और आॅफ दोनों तरह की गेंदबाजी करने में माहिर हैं। वे अब तक टेस्ट में 52.22 के औसत से 44 विकेट और वनडे में 44.26 के औसत से 54 विकेट भी ले चुके हैं। अगर उनकी इस प्रतिभा का बेहतर उपयोग किया जाता तो वे दुनिया के महान गेंदबाजों में भी शुमार होते।
उनके आलोचक जब-तब कहते रहे हैं कि अकसर सचिन सिर्फ अपने लिए खेलते हैं। भले ही उनकी कई शतकीय या अर्धशतकीय पारी टीम इंडिया को जिताने में काम न आई हों लेकिन उन्होंने हमेशा अपने प्रदर्शन से टीम को जिताने में अहम भूमिका निभाई। टीम में उनकी उपस्थिति मात्र से विरोधी टीम के खिलाड़ियों के हौसले पस्त हो जाते हैं। विरोधी टीम का पहला मकसद सचिन को आउट करना होता रहा है। यह पहले भी होता था, अब भी हो रहा है। उनकी बल्लेबाजी का डर गेंदबाजों पर इस कदर हावी होता है कि जब वे क्रीज पर जम जाएं तो उनके सामने गेंद डालने से पहले गेंदबाज सिहर जाते हैं। इसका अंदाजा बल्लेबाजों में भय   पैदा कर देने वाले दुनिया के महान गेंदबाज शेन वार्न द्वारा सचिन के बारे में कहे गए उस बयान से लगाया जा सकता है, जिसमें उन्होंने एक बार कहा था, ‘सचिन का बल्ला उन्हें सपने में भी डराता है। उनके सामने गेंदबाजी करने से वे खौफ खा जाते हैं।’ शेन वार्न का यह खौफ आज भी उनके अंदर इस कदर घरकर बैठा है कि ग्वालियर वनडे में सचिन की वर्ल्ड रिकार्ड (नाबाद 200 रन) पारी देखकर उन्हें कहना पड़ा, ‘भगवान का शुक्र है कि रिकार्डों के इस बादशाह को वे गेंद नहीं डाल रहे थे। सचिन पूरी लय में थे। उनकी बल्लेबाजी देखकर तो यही लग रहा था कि रनों का प्रवाह रोकना किसी भी गेंदबाज के वश में नहीं था। मेरी नजर में इस रिकार्ड को बनाने के लिए सचिन से बेहतर खिलाड़ी कोई और नहीं हो सकता था।’ लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर भी सचिन की उस ऐतिहासिक पारी को देखकर यह कहने से नहीं चूके कि अब वे टेस्ट में ब्रायन लारा (400*) के रिकार्ड को तोड़ सकते हैं और वनडे में भी इससे और बड़ी पारी खेल सकते हैं। सचिन के बारे में दुनिया के सार्वकालिक महान क्रिकेटर सर डॉन ब्रेडमैन ने कहा था, ‘सचिन को सिर्फ टेलीविजन में खेलते हुए देखा है, वह मेरी जैसी ही टेक्नीक से स्ट्रोक लगाता है। मैंने अपना खेल कभी टीवी पर कभी नहीं देखा, लेकिन सचिन का खेल देखकर महसूस होता है, यह प्लेयर बिलकुल मेरे जैसा ही खेलता है।’ यह एक महान खिलाड़ी की एक महान खिलाड़ी के प्रति व्यक्त की गई भावना है। इतना बड़ा खिलाड़ी होते हुए सचिन हमेशा निर्विवाद रहे। विनम्रता व सौम्यता उनके अंदर इतनी कूट-कूटकर भरी है कि उन्होंने कभी किसी दूसरे साथी खिलाड़ी की बुराई नहीं की और न ही वे कभी विवादों में रहे। यही सब गुण उन्हें एक महान खिलाड़ी होने का सबूत देता है। उनका खुद का सपना है कि अगले साल भारतीय उपमहाद्वीप में होने वाले विश्वकप का खिताब दूसरी बार भारत को दिलाएं। उम्मीद करते हैं कि उनका यह सपना भी पूरा हो जाएगा।
क्रिकेट के इस भगवान को अभी और मुकाम हासिल करना है। कई और रिकार्ड अपने नाम करना बाकी है। इन 20 सालों में उन्होंने अपनी खेल टेक्नीक से देश ही नहीं, दुनिया के लोगों को क्रिकेट का दीवाना बना दिया। उन्होंने क्रिकेट में पिछले दो दशकों में बच्चों से लेकर युवा और बूढ़ों तक के दिलो-दिमाग व जुबान पर कपिल, गावस्कर को हटाकर सिर्फ सचिन का नाम बसा दिया। अब तो नई पीढ़ी के लिए क्रिकेट का मतलब ही ‘सचिन’ हो गया है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने महात्मा गांधी के बारे में कहा था, ‘आने वाली पीढ़ी शायद ही विश्वास करे कि हाड़-मांस का एक दुर्लभ  इंसान भी  इस दुनिया कभी पैदा हुआ था।’ सचिन के परिप्रेक्ष्य में भी यही कहा जा सकता है कि आने वाली पीढ़ी शायद ही विश्वास करे कि इस दुनिया में सचिन जैसा महान खिलाड़ी भी पैदा हुए हैं। सचिन के दोहरा शतक लगाने के बाद तो क्रिकेटप्रेमी समेत देशभर से उन्हें देश सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ देने की मांग उठने लगे लगी है। पूर्व भारतीय कप्तान अजीत वाडेकर, कपिलदेव, सुनील गावस्कर, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण समेत अन्य क्रिकेटरों नें भी उन्हें ‘भारत रत्न’ देने की मांग की है। सचिन भारत का गौरव है और वे निश्चित रूप से ‘भारत रत्न’ हैं। इसलिए उन्हें यह सम्मान मिलना ही चाहिए।  सचिन ने भी बड़ी विनम्रता से स्वीकार करते हुए कहा है कि ‘भारत रत्न’ पाना हर भारतीय का सपना होता है और वह भी उससे अलग नहीं है। बावजूद इसके उन्हें देश का यह सर्वोच्च सम्मान मिले या न मिले, लेकिन वे ‘भारत रत्न’ हैं और हमेशा रहेंगे।
                                                                                                         shankar.chandraker@gmail.com 

2 टिप्‍पणियां:

SANJEEV RANA ने कहा…

BILKUL THIK KAHA AAPNE
aur sabase badi unki khasiyat yah hain ki wo kabhi kisi par comment nhi karte .
aur unka savbhaav bahut acha h sayad isiliye unka career itna lamba ja raha h.
m unka bahut bada parshanshak hu.
bhagwaan kare ki wo aise hi desh ka naam roshan karte rahe .

Mayur Malhar ने कहा…

shankar bhai blog ki dunia mein aapka swagat hain.